कविता हमारे मनोभावों को उच्छवासित करके हमारे जीवन में एक नया जीव डाल देती है। हम सृष्टि के सौन्दर्य को देखकर मोहित होने लगते हैं।कविता के द्वारा हम संसार के सुख, दुःख, आनन्द और क्लेश आदि यथार्थ रूप से अनुभव कर सकते हैं. -Dr.Dayaram Aalok,M.A.,Ayurved Ratna,D.I.Hom(London)
हम पंछी उन्मुक्त गगन के पिंजरबद्ध न गा पाऍंगे कनक-तीलियों से टकराकर पुलकित पंख टूट जाऍंगे । हम बहता जल पीनेवाले मर जाऍंगे भूखे-प्यासे कहीं भली है कटुक निबोरी कनक-कटोरी की मैदा से । स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में अपनी गति, उड़ान सब भूले बस सपनों में देख रहे हैं तरू की फुनगी पर के झूले
ऐसे थे अरमान कि उड़ते नील गगन की सीमा पाने लाल किरण-सी चोंच खोल चुगते तारक-अनार के दाने । होती सीमाहीन क्षितिज से इन पंखों की होड़ा-होड़ी या तो क्षितिज मिलन बन जाता या तनती सॉंसों की डोरी । नीड़ न दो, चाहे टहनी का आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो लेकिन पंख दिए हैं तो आकुल उड़ान में विघ्न न डालो ।
शहीद पर कविता - एक शहीद बेटे की अपनी माँ के प्रति भावना
=============== ============== = ===== शहादत का सेहरा बाँधे, मृत्यु से विवाह रचाता हूँ. जन्मभूमि की रक्षा खातिर, अपनी भेंट चढ़ाता हूँ. मैं तेरा बेटा बनकर आया, इस दुनिया मे मां लेकिन. भारत मां का बेटा बनकर, इस दुनिया सेजाता हूँ. मां देख तिरंगा मेरे तन पर, कितना सुंदर खिलता है. ऐसा कफ़न मेरी मां बस, किस्मतवालो को मिलता है. देकर समर्पण मातृभूमि को, गर्व से मैंइठलाता हूँ. मैं तेरा बेटा बनकर आया, इस दुनिया मे मां लेकिन. भारत मां का बेटा बनकर, इस दुनिया सेजाता हूँ. एक अकेले मैने मां,दस-दस को धूल चटाई है. मैने पीठ दिखाई नही, गोली सीने पर खाई है. गिरने से पहले शत्रु को, तारे दिनमे दिखलाता हूँ. मैं तेरा बेटा बनकर आया, इस दुनिया मे मां लेकिन. भारत मां का बेटा बनकर, इस दुनिया सेजाता हूँ. मेरी शहादत को मां तुम, मत आँसू से धो देना. मरकर भी मैं अमर हुआ, न वीरगति पर रो देना. देकर साँसे इस मिट्टी को, इसका क़र्ज़चुकाता हूँ. मैं तेरा बेटा बनकर आया, इस दुनिया मे मां लेकिन. भारत मां का बेटा बनकर, इस दुनिया सेजाता हूँ. ऋणी हूँ तेरा मेरी मां, ऋण तेरा चुका नपाया मैं तेरे कदमो मे खुशियो की, माला सजा न पाया मैं. पर भारत मां के चरणो मे, अपनी देह बिछाता हूँ. मैं तेरा बेटा बनकर आया, इस दुनिया मे मां लेकिन. भारत मां का बेटा बनकर, इस दुनिया सेजाता हूँ. संभव है मां भ्रष्टाचारी, हक शहीदो काभी खा जायें. कफ़न की कीमत लगे और, ताबूत घोटाले हो जायें. रहा बीच कुछ मक्कारो के, पर अपना फ़र्ज़ निभाता हूँ. मैं तेरा बेटा बनकर आया, इस दुनिया मे मां लेकिन. भारत मां का बेटा बनकर, इस दुनिया सेजाता हूँ. मैं तेरा बेटा बनकर आया, इस दुनिया मे मां लेकिन. भारत मां का बेटा बनकर, इस दुनिया सेजाता हूँ...!!
मैं अमर शहीदों का चारण उनके गुण गाया करता हूँ जो कर्ज राष्ट्र ने खाया है, मैं उसे चुकाया करता हूँ।
यह सच है, याद शहीदों की हम लोगों ने दफनाई है यह सच है, उनकी लाशों पर चलकर आज़ादी आई है, यह सच है, हिन्दुस्तान आज जिन्दा उनकी कुर्वानी से यह सच अपना मस्तक ऊँचा उनकी बलिदान कहानी से।
वे अगर न होते तो भारत मुर्दों का देश कहा जाता, जीवन ऍसा बोझा होता जो हमसे नहीं सहा जाता, यह सच है दाग गुलामी के उनने लोहू सो धोए हैं, हम लोग बीज बोते, उनने धरती में मस्तक बोए हैं। इस पीढ़ी में, उस पीढ़ी के मैं भाव जगाया करता हूँ। मैं अमर शहीदों का चारण उनके यश गाया करता हूँ।
यह सच उनके जीवन में भी रंगीन बहारें आई थीं, जीवन की स्वप्निल निधियाँ भी उनने जीवन में पाई थीं, पर, माँ के आँसू लख उनने सब सरस फुहारें लौटा दीं, काँटों के पथ का वरण किया, रंगीन बहारें लौटा दीं।
उनने धरती की सेवा के वादे न किए लम्बे—चौड़े, माँ के अर्चन हित फूल नहीं, वे निज मस्तक लेकर दौड़े, भारत का खून नहीं पतला, वे खून बहा कर दिखा गए, जग के इतिहासों में अपनी गौरव—गाथाएँ लिखा गए। उन गाथाओं से सर्दखून को मैं गरमाया करता हूँ। मैं अमर शहीदों का चरण उनके यश गाया करता हूँ।
है अमर शहीदों की पूजा, हर एक राष्ट्र की परंपरा उनसे है माँ की कोख धन्य, उनको पाकर है धन्य धरा, गिरता है उनका रक्त जहाँ, वे ठौर तीर्थ कहलाते हैं, वे रक्त—बीज, अपने जैसों की नई फसल दे जाते हैं।
इसलिए राष्ट्र—कर्त्तव्य, शहीदों का समुचित सम्मान करे, मस्तक देने वाले लोगों पर वह युग—युग अभिमान करे, होता है ऍसा नहीं जहाँ, वह राष्ट्र नहीं टिक पाता है, आजादी खण्डित हो जाती, सम्मान सभी बिक जाता है। यह धर्म—कर्म यह मर्म सभी को मैं समझाया करता हूँ। मैं अमर शहीदों का चरण उनके यश गाया करता हूँ।
पूजे न शहीद गए तो फिर, यह पंथ कौन अपनाएगा? तोपों के मुँह से कौन अकड़ अपनी छातियाँ अड़ाएगा? चूमेगा फन्दे कौन, गोलियाँ कौन वक्ष पर खाएगा? अपने हाथों अपने मस्तक फिर आगे कौन बढ़ाएगा?
पूजे न शहीद गए तो फिर आजादी कौन बचाएगा? फिर कौन मौत की छाया में जीवन के रास रचाएगा? पूजे न शहीद गए तो फिर यह बीज कहाँ से आएगा? धरती को माँ कह कर, मिट्टी माथे से कौन लगाएगा? मैं चौराहे—चौराहे पर ये प्रश्न उठाया करता हूँ। मैं अमर शहीदों का चारण उनके यश गाया करता हूँ। जो कर्ज ने खाया है, मैं चुकाया करता हूँ।
हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती -जय शंकर प्रसाद
हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती स्वयंप्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो प्रशस्त पुण्य पंथ हैं - बढ़े चलो बढ़े चलो असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी सपूत मातृभूमि के रुको न शूर साहसी अराति सैन्य सिंधु में, सुबाड़वाग्नि से जलो प्रवीर हो जयी बनो - बढ़े चलो बढ़े चलो
हिमालय के आँगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार उषा ने हँस अभिनंदन किया और पहनाया हीरक-हार
जगे हम, लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक व्योम-तम पुँज हुआ तब नष्ट, अखिल संसृति हो उठी अशोक
विमल वाणी ने वीणा ली, कमल कोमल कर में सप्रीत सप्तस्वर सप्तसिंधु में उठे, छिड़ा तब मधुर साम-संगीत
बचाकर बीज रूप से सृष्टि, नाव पर झेल प्रलय का शीत अरुण-केतन लेकर निज हाथ, वरुण-पथ पर हम बढ़े अभीत
सुना है वह दधीचि का त्याग, हमारी जातीयता विकास पुरंदर ने पवि से है लिखा, अस्थि-युग का मेरा इतिहास
सिंधु-सा विस्तृत और अथाह, एक निर्वासित का उत्साह दे रही अभी दिखाई भग्न, मग्न रत्नाकर में वह राह धर्म का ले लेकर जो नाम, हुआ करती बलि कर दी बंद हमीं ने दिया शांति-संदेश, सुखी होते देकर आनंद
विजय केवल लोहे की नहीं, धर्म की रही धरा पर धूम भिक्षु होकर रहते सम्राट, दया दिखलाते घर-घर घूम
यवन को दिया दया का दान, चीन को मिली धर्म की दृष्टि मिला था स्वर्ण-भूमि को रत्न, शील की सिंहल को भी सृष्टि
किसी का हमने छीना नहीं, प्रकृति का रहा पालना यहीं हमारी जन्मभूमि थी यहीं, कहीं से हम आए थे नहीं
जातियों का उत्थान-पतन, आँधियाँ, झड़ी, प्रचंड समीर खड़े देखा, झेला हँसते, प्रलय में पले हुए हम वीर
चरित थे पूत, भुजा में शक्ति, नम्रता रही सदा संपन्न हृदय के गौरव में था गर्व, किसी को देख न सके विपन्न
हमारे संचय में था दान, अतिथि थे सदा हमारे देव वचन में सत्य, हृदय में तेज, प्रतिज्ञा मे रहती थी टेव
वही है रक्त, वही है देश, वही साहस है, वैसा ज्ञान वही है शांति, वही है शक्ति, वही हम दिव्य आर्य-संतान
जियें तो सदा इसी के लिए, यही अभिमान रहे यह हर्ष निछावर कर दें हम सर्वस्व, हमारा प्यारा भारतवर्ष
बीती विभावरी जाग री! अम्बर पनघट में डुबो रही तारा घट ऊषा नागरी। खग कुल-कुल सा बोल रहा, किसलय का अंचल डोल रहा, लो यह लतिका भी भर लाई मधु मुकुल नवल रस गागरी। अधरों में राग अमंद पिये, अलकों में मलयज बंद किये तू अब तक सोई है आली आँखों में भरे विहाग री।
जब तक धरती पर अन्धकार मैं दीप जलाता जाऊंगा | मै दीन-हीन ,नैराश्य-हृदय में मंगल ज्योति जलाऊंगा।
मानवता अब भी आत्म रोग ,अविवेक तिमिर में लिपटी है धरती के मानव की हलचल भौतिक -बंधन में सिमटी है। अनुभुति नहीं आदर्शों की अवसरवादी सिद्धांत सबल हर ज्योति-पुंज से नफ़रत है सब ओर तिमिर साम्राज्य प्रबल
मैं गर्दिश के अभिषप्त मनुज को जीवन-पथ दिखलाऊंगा जब तक धरती पर अंधकार मैं दीप जलाता जाऊंगा।
दीवाली पर दीपों की जगमग केवल रस्म निभाना है। अपने घर-आंगन की सज-धज करलो आदर्श पुराना है। पर कभी किसी ने इस जग मग से दूर कुटिर में झांका है? उस घास फ़ूस की छत नीचे पंजर ने आटा फ़ांका है
मैं वैभव को एकांत अभावों का हमदर्द बनाऊंगा, जब तक धरती पर अंधकार मैं दीप जलाता जाऊंगा।
ऋषि दयानंद ने आडंबर-पाखण्ड-पुंज पिघलाया था, अज्ञान ,अशिक्षा मे गाफ़िल जन को सद्मार्ग दिखाया था। गांधी,ईसा,सुकरात बुद्ध ने जग जीवन निर्माण किया, पर अघ-लिप्तों ने युग पुरुषों का कब कितना सम्मान किया? मैं ज्योति जलाने वालों को जग का आदर्श बनाऊंगा जब तक धरती पर अंधकार मैं दीप जलाता जाऊंगा।
आलोक प्रशासन होते ही तम तुरत अंग सकुचाता है। कच्छप गुणधारी तिमिर सदा अवसर पर घात लगाता है। मायावी तम की हलचल में कितना मोहक आकर्षण है सामान्य दीप के जीवन का अंधड से शक्ति परीक्षण है।
मैं बुझने वाले हर दीपक का संरक्षक बन जाऊंगा जब तक धरती पर अंधकार मैं दीप जलाता जाऊंगा।
समीक्षा:
डॉ. दयाराम आलोक जी की यह कविता दीपावली के पर्व को एक नए दृष्टिकोण से देखती है। कविता में दीपावली के पर्व को सिर्फ एक रस्म निभाने के रूप में नहीं देखा गया है, बल्कि एक आदर्श के रूप में देखा गया है जो मानवता को राह दिखाता है। कविता में दीपावली के पर्व को अन्धकार के विरुद्ध एक लड़ाई के रूप में देखा गया है, जहां दीप जलाने वाला व्यक्ति अन्धकार के विरुद्ध एक ज्योति के रूप में खड़ा होता है। कविता में दीपावली के पर्व को मानवता के लिए एक आदर्श के रूप में देखा गया है, जो मानवता को आत्म रोग, अविवेक तिमिर से मुक्ति दिलाता है। कविता में दीपावली के पर्व को वैभव को एकांत अभावों का हमदर्द बनाने के लिए भी आह्वान किया गया है। कविता में दीपावली के पर्व को ऋषि दयानंद, गांधी, ईसा, सुकरात बुद्ध जैसे युग पुरुषों के आदर्शों को आगे बढ़ाने के लिए भी आह्वान किया गया है। कविता में दीपावली के पर्व को तम तुरत अंग सकुचाता है, कच्छप गुणधारी तिमिर सदा अवसर पर घात लगाता है, मायावी तम की हलचल में कितना मोहक आकर्षण है, सामान्य दीप के जीवन का अंधड से शक्ति परीक्षण है, जैसी पंक्तियों के माध्यम से अन्धकार के विरुद्ध एक लड़ाई का वर्णन किया गया है। कविता में दीपावली के पर्व को बुझने वाले हर दीपक का संरक्षक बन जाने के लिए भी आह्वान किया गया है। कविता में दीपावली के पर्व को एक ज्योति के रूप में देखा गया है, जो मानवता को राह दिखाती है और अन्धकार के विरुद्ध एक लड़ाई लड़ती है
भृंग को भी दंग कर देता तुम्हारा रूप प्यारा विरस मन में मोद भरता हैं मदिर सौरभ तुम्हारा लहलहाती टहनियों में रम्यता से उभर जाते। पवन-तन से लिपटकर वातावरण में मह महाते।
हरित धरती के तुम्हीं अभिराम राजकुमार मंजुल नव्य,सुरभित,दिव्य,उन्नत,भव्य रूप सुरम्य चंचल जननी ऊषा नित्य खग कलरव के मृदु स्वर में जगाती बाल रवि की रश्मियां नव पंखुडियों में रंग भरती।
तितलियां ,कीडे पतंगे मचलकर उड पास आते भिनकती मधुमखियां परिमल कणों से मधु बनातीं। कंटकों में निडर हो खिलता गुलाब प्रसुन्न कैसा आपदा में मुस्कराने का मधुर संदेश देता।
पोखरों में खिल रहे अनुपम सजीले कमल उज्ज्वल कर रहे संकेत उठ मालिन्य से बन शुद्ध निर्मल। झूमता मदहोश गैंदा पवन से अठखेलता है। कुमुदनी की बंद पांखें इन्दु निशि में खोलता है।
प्रकृति रमणी नित्य नूतन कुसुम वसनों में संवरती जूहि,चंपक ओ’ चमेली पुष्प छबि जन हृदय- हरती। झिलमिलाते, टिमटिमाते हैं विपुल तारक गगन में महकते सौरभ लुटाते सुमन मानव मैदिनी में।
डॉ. दयाराम आलोक जी की यह रचना फूलों के सौन्दर्य और उनके द्वारा मानव जीवन को दिए जाने वाले संदेशों को प्रस्तुत करती है। इस रचना में फूलों के विभिन्न रंगों और सुगंधों का वर्णन किया गया है, जो मानव जीवन में खुशियों और सौंदर्य को बढ़ाते हैं। रचना में फूलों को मानव जीवन के लिए एक प्रेरणा के रूप में देखा गया है, जो हमें आपदा में मुस्कराने का मधुर संदेश देते हैं। फूलों को प्रकृति की रमणी के रूप में देखा गया है, जो नित्य नूतन कुसुम वसनों में संवरती है और मानव हृदय को हरती है। रचना में फूलों के विभिन्न प्रकारों का वर्णन किया गया है, जैसे कि गुलाब, कमल, गैंदा, कुमुदनी आदि, जो अपनी सुगंध और सौंदर्य से मानव जीवन को समृद्ध बनाते हैं। इस रचना में डॉ. आलोक जी ने फूलों के माध्यम से मानव जीवन को दिए जाने वाले संदेशों को प्रस्तुत किया है, जैसे कि आपदा में मुस्कराने का मधुर संदेश, प्रकृति के सौंदर्य को सराहने का संदेश, और मानव जीवन में खुशियों और सौंदर्य को बढ़ाने का संदेश। यह रचना 1963 में "स्वास्थ्य सरिता" मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी और पाठकों ने इसे बहुत सराहा था
गांधी जयंति 2 october 1968 , प्रिन्ट मीडिया मे प्रकाशित
. गांधी नैतिकता,कर्म,मुक्ति के बोधक थे. वे सत्य,अहिंसा प्रेम शांति के पोषक थे. "वह राजनीति निष्प्राण कि जिसमें धर्म नहीं" और धर्म हीन शासन से जन कल्याण नहीं.
मानव -मानव थे तुल्य दृष्टि में गांधी के. सब धर्म श्रेष्ठ थे उस मानवतावादी के. वह आचारों की शुद्धि हेतु बल देता था. और स्वयं कष्ट सह दुष्ट हृदय पिघलाता था
वे धीमी-धीमी क्रांति चाहने वाले थे. उनके समाजवादी सिद्धांत निराले थे. "धन तो भाई ईश्वर की एक धरोहर है" "परमार्थ करो उपलब्ध तुम्हे यदि अवसर है" जब वर्ष गांठ आये हम उनको याद करें. केवल इतना करना मिथ्या विज्ञापन है. जब तक समाज में ऊंच-नीच की बातें हैं गांधी के प्रति हम लोगों का अंधापन है।.
पाखण्ड मत करो केवल सूत कताई का. खद्दरधारण कर मजा न लो नेताई का. खद्दर के चद्दर से मत अपने पाप ढको. निज अवलंबन को आडंबर का रूप न दो.
भारत में अब हिंसाएं और हडतालें हैं. अब धर्म,जाति , भाषा के प्रश्न उछालें हैं गांधी के अमृत वचन हमें अब याद नहीं. दु:ख है हमको केवल गांधीजी प्यारे हैं.