23 अक्तूबर 2010

गांधी के अमृत वचन हमें अब याद नहीं.: डॉ॰दयाराम आलोक


गांधी जयंति 2 october 1968 , ध्वज में प्रकाशित कृति
.

गांधी के अमृत वचन हमें अब याद नहीं.



गांधी नैतिकता,कर्म,मुक्ति के बोधक थे.
वे सत्य,अहिंसा प्रेम शांति के पोषक थे.
"वह राजनीति निष्प्राण कि जिसमें धर्म नहीं"
और धर्म हीन शासन से जन कल्याण नहीं.

मानव -मानव थे तुल्य दृष्टि में गांधी के.
सब धर्म श्रेष्ठ थे उस मानवतावादी के.
वह आचारों की शुद्धि हेतु बल देता था.
और स्वयं कष्ट सह दुष्ट हृदय पिघलाता था

वे धीमी-धीमी क्रांति चाहने वाले थे.
उनके समाजवादी सिद्धांत निराले थे.
"धन तो भाई ईश्वर की एक धरोहर है"
"परमार्थ करो उपलब्ध तुम्हे यदि अवसर है"




जब वर्ष गांठ आये हम उनको याद करें.
केवल इतना करना मिथ्या विज्ञापन है.
जब तक समाज में ऊंच-नीच की बातें हैं
गांधी के प्रति हम लोगों का अंधापन है।.

पाखण्ड मत करो केवल सूत कताई का.
खद्दर लपेटकर मजा न लो नेताई का.
खद्दर के चद्दर से मत अपने पाप ढको.
निज अवलंबन को आडंबर का रूप न दो.

भारत में अब हिंसाएं और हडतालें हैं.
अब धर्म,प्रांत भाषा के प्रश्न उछालें हैं
गांधी के अमृत वचन हमें अब याद नहीं.
दु:ख है हमको केवल गांधीजी प्यारे हैं.
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3 टिप्‍पणियां:

dilip rathore shamgarh ने कहा…

कांग्रेस को गांधी के वचनों से क्या लेना देना ,चुनाओं में गांधी शब्द जादू की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं,राजीव,गांधी,सोनिया गांधी,राहुल गांधी ।और सच में देखें तो इन लोगों का गांधीजी से दूर का रिश्ता भी नहीं है।

बेनामी ने कहा…

भारत में नेता लोगों का पाखंड और दिखावा चिंता का विषय है।गांधीजी के सिद्दांतों का कचूमर बनाने में लगे हुए हैं।ऐसे दोगले नेताओं पर कानूनन प्रतिबंध लगाया जाना उचित होगा कि ये वोट कबाडने के लिये गांधीजी के नाम का इस्तेमाल न करें। शिक्छाप्रद कविता के लिये आभार!

Vijai Mathur ने कहा…

.एकदम सही बात कही है. दरअसल गांधी जी का अनुसरण करने की आज महती आवश्यकता है.