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15.8.10

" आओ आज करें अभिनंदन" : डॉ. दयाराम आलोक

        

   "आओ आज करें अभिनंदन"


रचयिता -डॉ.दयाराम आलोक 

संविधान का 77 वीं वर्षगांठ
हम मन रहे हैं
जन गण मन में जोश बह रहा

गांव,गली,शहरों,बाजारों,
सभी जगह जन आंदोलित हैं

बच्चे कैसे आल्हादित हैं
आजादी का असली मतलब
शायद इन्हें अधिक मालूम है।

हर संस्था में तीव्र बाढ है
कार्यक्रमों की
ध्वज आरोहण
छात्र चल रहे पंक्ति बद्ध हो
नारे गगन प्रकंपित करते
भाषण,नाटक,नृत्य,प्रदर्शन
झूम रहा हर हिन्दुस्तानी


पर स्वतंत्रता
जिसको पाया
देश-भक्त सच्चे वीरों ने
अग्नि ज्वलित की जन मानस में--
"आजादी पैदाईश हक है"
मुझे खून दो आजादी लो"
अंग्रेजों छोडो भारत को"

बाल,लाल,पाल,
आजाद भगत सिंह,बोस
गांधी,नेहरू,वल्लभ भाई
अन्य कई बलिदान हुए
तब भारत की
आजादी आई।
साहस धैर्य,त्याग का जज्बा
जो उनमें था
अपनाना है।


लेकिन अब कुछ और हो रहा
बलिदानी भारत के बेटे
सत्ता को आराध्य मानकर
जूझ रहे हैं तन,मन,धन से
गांधी का प्यारा सत्याग्रह
अब होता है
स्वार्थपूर्ण लक्ष्यों के खातिर

प्रजातंत्र के अभिभावक गण
जनता के निर्वाचित नेता
मुक्के चला रहे सदनों में
किसके खातिर?

दाल गले वह दल अच्छा है
दल मानों पेडों की डालें
उछल रहे हैं डाल -डाल पर
बंदर सम मतवाले नेता।

रेल उलटना आग लगाना
बंद और चक्का जाम लगाना
संप्रदाय,भाषाई झगडे
नये धर्म बन गये देश के

शायद हम अब भी गुलाम हैं
वही क्रियाएं दुहर रही हैं
जो सैंतालिस पूर्व हुई थीं

गलत साध्य,
टुच्चे साधन हैं
चिंतन,मनन,त्याग,जनसेवा
सबसे अधिक जरूरी सदगुण
सबसे कम विकसित दिखते हैं।
आओ आज करें अभिनंदन
उत्साही तरुणों,युवकों का
राष्ट्र-धर्म को अंगीकार कर
बढें समुन्नत करें देश को

विडिओ --आओ आज करें अभिनंदन !




कविता "आओ आज करें अभिनंदन" का भावार्थ

डॉ. दयाराम आलोक की यह कविता संविधान की 77वीं वर्षगांठ के अवसर पर लिखी गई है। इसमें स्वतंत्रता, लोकतंत्र और वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों का गहन चित्रण है।

🪔 मुख्य भावार्थ

  • संविधान का उत्सव और जनउत्साह कवि बताता है कि पूरे देश में संविधान दिवस पर उत्साह और जोश है। गाँव, गली, शहर, बाजार हर जगह कार्यक्रम हो रहे हैं। बच्चे और युवा विशेष रूप से आनंदित हैं।

  • स्वतंत्रता का महत्व और बलिदान कवि याद दिलाता है कि आजादी हमें सहज नहीं मिली, बल्कि वीरों के बलिदान से मिली है। भगत सिंह, बोस, आजाद, गांधी, नेहरू और अन्य महान नेताओं ने त्याग और साहस से स्वतंत्रता दिलाई।

  • वर्तमान राजनीति की आलोचना कवि दुख व्यक्त करता है कि आज के नेता सत्ता को साध्य मानकर स्वार्थपूर्ण संघर्ष कर रहे हैं। संसद में मारपीट, दलों की आपसी खींचतान, बंद-चक्का जाम, संप्रदाय और भाषाई झगड़े लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं।

  • गुलामी की पुनरावृत्ति कवि कहता है कि हम आज भी मानसिक रूप से गुलाम हैं क्योंकि वही गलतियां दोहराई जा रही हैं जो स्वतंत्रता से पहले थीं।

  • सद्गुणों की आवश्यकता चिंतन, मनन, त्याग और जनसेवा जैसे सद्गुण आज सबसे अधिक आवश्यक हैं, परंतु सबसे कम दिखाई देते हैं।

  • युवाओं का आह्वान अंत में कवि युवाओं को राष्ट्रधर्म अपनाने और देश को समुन्नत बनाने का आह्वान करता है।

🌺 सारांश

यह कविता स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानों को स्मरण कर वर्तमान राजनीति की विसंगतियों पर प्रहार करती है। साथ ही यह युवाओं को प्रेरित करती है कि वे राष्ट्रधर्म को अपनाकर देश को प्रगति की ओर ले जाएँ।

 कविता "आओ आज करें अभिनंदन" का संक्षिप्त भावार्थ (बिंदुवार)

  • संविधान की 77वीं वर्षगांठ पर पूरे देश में उत्साह और जोश है।

  • गाँव, गली, शहर, बाजार हर जगह कार्यक्रम और ध्वजारोहण हो रहे हैं।

  • स्वतंत्रता हमें वीरों के बलिदान और त्याग से मिली है।

  • भगत सिंह, बोस, आजाद, गांधी, नेहरू, वल्लभ भाई जैसे महान नेताओं का स्मरण।

  • वर्तमान राजनीति में स्वार्थ और सत्ता की लालसा बढ़ गई है।

  • संसद में मारपीट, बंद-चक्का जाम, संप्रदाय और भाषाई झगड़े लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं।

  • हम मानसिक रूप से अब भी गुलामी की आदतें दोहरा रहे हैं।

  • चिंतन, त्याग, जनसेवा जैसे सद्गुण आज सबसे अधिक आवश्यक हैं।

  • युवाओं को राष्ट्रधर्म अपनाकर देश को प्रगति की ओर ले जाने का आह्वान।

👉 सार: कविता स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानों को याद दिलाती है, वर्तमान राजनीति की विसंगतियों पर प्रहार करती है और युवाओं को राष्ट्रनिर्माण के लिए प्रेरित करती है।

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