15/8/10

" आओ आज करें अभिनंदन."- डॉ॰दयाराम आलोक


साप्ताहिक प्रभात किरण के स्वाधीनता विशेषांक
१५ अगस्त १९६९ में प्रकाशित कृति



   "आओ आज करें अभिनंदन"
आजादी की यह बाईसवीं
वर्ष गांठ हम मना रहे हैं.
जन गण मन में जोश बह रहा
गांव,गली,शहरों,बाजारों,
सभी जगह जन आंदोलित हैं

बच्चे कैसे आल्हादित हैं
आजादी का असली मतलब
शायद इन्हें अधिक मालूम है।

हर संस्था में तीव्र बाढ है
कार्यक्रमों की
ध्वज आरोहण
छात्र चल रहे पंक्ति बद्ध हो
नारे गगन प्रकंपित करते
भाषण,नाटक,नृत्य,प्रदर्शन
झूम रहा हर हिन्दुस्तानी

पर स्वतंत्रता
जिसको पाया
देश-भक्त सच्चे वीरों ने
अग्नि ज्वलित की जन मानस में--
"आजादी पैदाईश हक है"
मुझे खून दो आजादी लो"
अंग्रेजों छोडो भारत को"

बाल,लाल,पाल,
आजाद भगत सिंह,बोस
गांधी,नेहरू,वल्लभ भाई
अन्य कई बलिदान हुए
तब भारत की
आजादी आई।
साहस धैर्य,त्याग का जज्बा
जो उनमें था
अपनाना है।





लेकिन अब कुछ और हो रहा
बलिदानी भारत के बेटे
सत्ता को आराध्य मानकर
जूझ रहे हैं तन,मन,धन से
गांधी का प्यारा सत्याग्रह
अब होता है
स्वार्थपूर्ण लक्ष्यों के खातिर

प्रजातंत्र के अभिभावक गण
जनता के निर्वाचित नेता
मुक्के चला रहे सदनों में
किसके खातिर?

दाल गले वह दल अच्छा है
दल मानों पेडों की डालें
उछल रहे हैं डाल -डाल पर
बंदर सम मतवाले नेता।

रेल उलटना आग लगाना
बंद और चक्का जाम लगाना
संप्रदाय,भाषाई झगडे
नये धर्म बन गये देश के

शायद हम अब भी गुलाम हैं
वही क्रियाएं दुहर रही हैं
जो सैंतालिस पूर्व हुई थीं

गलत साध्य,
टुच्चे साधन हैं
चिंतन,मनन,त्याग,जनसेवा
सबसे अधिक जरूरी सदगुण
सबसे कम विकसित दिखते हैं।
आओ आज करें अभिनंदन
उत्साही तरुणों,युवकों का
राष्ट्र-धर्म को अंगीकार कर
बढें समुन्नत करें देश को
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