"दीवाली सिर्फ घर सजाने का नाम नहीं है... अश्रुपूर्ण लोचनों को भी देखना होगा!"
"एक ऐसी दीवाली जो नव ज्योति अखबार में छपी और आज भी प्रासंगिक है"
"युद्ध के इस दौर में दीप जलाने का असली अर्थ क्या है? सुनिए..."
नवज्योति जयपुर अखबार में प्रकाशित डॉ.दयाराम आलोक की रचना-
नक्षत्रों की ज्योति मेघ का मुक्त हास धरती पर लाएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
युग बीते जग देख रहा है चकाचौंध जगमग दीवाली,
युद्ध द्रश्य है इधर ज्योति और उधर तिमिर मावस मतवाली।
नष्ट करो मालिन्य प्रसारो उज्वलता जगती ने जाना,
शृंगारित घर आंगन गलियां हुआ नयन रंजक वीराना।
अंधियारे के अधिवासों पर आओ दीप शिखा लहराएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
बाहर की सुन्दरता देखी अब अंतर की आंखे खोलो
घृणा,ग्लानि,ईर्षा ,दुर्गुण सब स्नेह,सत्य,समता से धोलो।
दीवाली का रूप हो जिसमें हर अभाव वैभव को छूले,
सम्प्रदाय-विद्वेष,ढोंग और कलुशित वर्ग विषमता भूलें।
यह प्रकाश वेला अति पावन सौहार्द्रिक सद्भाव जगाएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
ज्योतित जग में आज निहारो अश्रुपूर्ण लोचन कितने हैं,
वैभव के पोषक बेचारे दलित,क्षुधित पंजर कितने हैं।
हम न विचारें ऐसे मसले तब तक यह दीपक मेला है,
विस्फ़ोटक द्रव्यों से मानव खुश किन्तु प्रलय झेला है।
दयानंद,सुकरात दीप हैं जो सदियों तक राह दिखाएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
तुम मत ऐसे दीप जलाओ जिससे अंधकार उकसाए,
लुत्फ़ उठाना ठीक नहीं जो मजबूरों के दिल तडफ़ाए।
उन्हें मनाने दो दीवाली जिन्हें न खुशियां रास हुई हैं,
उन खुशियों को जीवन दे दो जो खुशियां बर्बाद हुई हैं।
ज्योति पर्व आवाहन करता जन मन दर्पण स्वच्छ बानाएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
युग बीते जग देख रहा है चकाचौंध जगमग दीवाली,
युद्ध द्रश्य है इधर ज्योति और उधर तिमिर मावस मतवाली।
नष्ट करो मालिन्य प्रसारो उज्वलता जगती ने जाना,
शृंगारित घर आंगन गलियां हुआ नयन रंजक वीराना।
अंधियारे के अधिवासों पर आओ दीप शिखा लहराएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
बाहर की सुन्दरता देखी अब अंतर की आंखे खोलो
घृणा,ग्लानि,ईर्षा ,दुर्गुण सब स्नेह,सत्य,समता से धोलो।
दीवाली का रूप हो जिसमें हर अभाव वैभव को छूले,
सम्प्रदाय-विद्वेष,ढोंग और कलुशित वर्ग विषमता भूलें।
यह प्रकाश वेला अति पावन सौहार्द्रिक सद्भाव जगाएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
ज्योतित जग में आज निहारो अश्रुपूर्ण लोचन कितने हैं,
वैभव के पोषक बेचारे दलित,क्षुधित पंजर कितने हैं।
हम न विचारें ऐसे मसले तब तक यह दीपक मेला है,
विस्फ़ोटक द्रव्यों से मानव खुश किन्तु प्रलय झेला है।
दयानंद,सुकरात दीप हैं जो सदियों तक राह दिखाएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
तुम मत ऐसे दीप जलाओ जिससे अंधकार उकसाए,
लुत्फ़ उठाना ठीक नहीं जो मजबूरों के दिल तडफ़ाए।
उन्हें मनाने दो दीवाली जिन्हें न खुशियां रास हुई हैं,
उन खुशियों को जीवन दे दो जो खुशियां बर्बाद हुई हैं।
ज्योति पर्व आवाहन करता जन मन दर्पण स्वच्छ बानाएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
नक्षत्रों की ज्योति, मेघ का मुक्त हास धरती पर लाएं...
डॉ. दयाराम आलोक जी की कालजयी रचना जो जयपुर के प्रतिष्ठित "नव ज्योति" अखबार में प्रकाशित हुई थी।
यह कविता केवल दीवाली के दीपों की नहीं, बल्कि मन के अंधेरे - घृणा, ग्लानि, ईर्षा, सम्प्रदाय-विद्वेष और वर्ग-विषमता को मिटाने का आह्वान है। कवि कहते हैं - दयानंद, सुकरात जैसे दीप सदियों तक राह दिखाते हैं, और सच्ची दीवाली तभी है जब हर अभाव वैभव को छू ले।
इस कविता में आप सुनेंगे:
युद्ध और जगमग दीवाली का द्वंद्व
बाहरी चकाचौंध vs अंतर की शुद्धि
दलित, क्षुधित, वैभवहीन के लिए दीप का संदेश
रचना: डॉ. दयाराम आलोक
"यदि आपको लगता है कि दीवाली की रोशनी हर झोपड़ी तक पहुँचनी चाहिए, तो इस कविता को एक ऐसे व्यक्ति तक ज़रूर पहुँचाइए जिसे आज खुशी की सबसे ज्यादा ज़रूरत है। कमेंट में लिखिए - 'आओ दीप जलाएं'"
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📤 इस दीवाली, एक दीया उनके नाम का भी जलाएं जिनकी खुशियां बर्बाद हुई हैं - इस वीडियो को शेयर करके।
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