03 मार्च 2010

उन्हें मनाने दो दीवाली-- डॉ॰दयाराम आलोक

नवज्योति जयपुर अखबार में प्रकाशित डॉ.दयाराम आलोक की रचना-                                
                                                                                 



नक्षत्रों की ज्योति मेघ का मुक्त हास धरती पर लाएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।

युग बीते जग देख रहा है चकाचौंध जगमग दीवाली,
युद्ध द्रश्य है इधर ज्योति और उधर तिमिर मावस मतवाली।
नष्ट करो मालिन्य प्रसारो उज्वलता जगती ने जाना,
शृंगारित घर आंगन गलियां हुआ नयन रंजक वीराना।

जब तक जगती में अंधकार - डॉ॰दयाराम आलोक
अंधियारे के अधिवासों पर आओ दीप शिखा लहराएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।

बाहर की सुन्दरता देखी अब अंतर की आंखे खोलो
घृणा,ग्लानि,ईर्षा ,दुर्गुण सब स्नेह,सत्य,समता से धोलो।
दीवाली का रूप हो जिसमें हर अभाव वैभव को छूले,
सम्प्रदाय-विद्वेष,ढोंग और कलुशित वर्ग विषमता भूलें।

यह प्रकाश वेला अति पावन सौहार्द्रिक सद्भाव जगाएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।


ज्योतित जग में आज निहारो अश्रुपूर्ण लोचन कितने हैं,
वैभव के पोषक बेचारे दलित,क्षुधित पंजर कितने हैं।
हम न विचारें ऐसे मसले तब तक यह दीपक मेला है,
विस्फ़ोटक द्रव्यों से मानव खुश किन्तु प्रलय झेला है।


दयानंद,सुकरात दीप हैं जो सदियों तक राह दिखाएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।

तुम मत ऐसे दीप जलाओ जिससे अंधकार उकसाए,
लुत्फ़ उठाना ठीक नहीं जो मजबूरों के दिल तडफ़ाए।
उन्हें मनाने दो दीवाली जिन्हें न खुशियां रास हुई हैं,
उन खुशियों को जीवन दे दो जो खुशियां बर्बाद हुई हैं।


ज्योति पर्व आवाहन करता जन मन दर्पण स्वच्छ बानाएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
                                     



2 टिप्‍पणियां:

rahul rathore ने कहा…

सुन्दर कविता।"लुत्फ़ उठाना ठीक नहीं जो मजबूरों के दिल तडफ़ाए" तथा "उन्हें मनाने दो दीवाली जिन्हें न खुशियां रास हुई हैं" इन पंक्तियों का यथार्थ साकार होने में ही इस पर्व की महानता निहित है।

बेनामी ने कहा…

aapka bahut bahut aabhar mahoday.
main jyada bada lekhak ya kavi to nhi hu magar jo dil me aata hai likh deta hu ya jo achha lagta hai copy kar leta hu.
umar kam hai aur aap jaise agar yu hi sahara dete rahe to bdi kripa hogi.

Vicky Babu