2/10/16

पंचवटी / मैथिलीशरण गुप्त/ पेज 1 से 6



पूज्य पिता के सहज सत्य पर, वार सुधाम, धरा, धन को,
चले राम, सीता भी उनके, पीछे चलीं गहन वन को।
उनके पीछे भी लक्ष्मण थे, कहा राम ने कि "तुम कहाँ?"
विनत वदन से उत्तर पाया—"तुम मेरे सर्वस्व जहाँ॥"

सीता बोलीं कि "ये पिता की, आज्ञा से सब छोड़ चले,
पर देवर, तुम त्यागी बनकर, क्यों घर से मुँह मोड़ चले?"
उत्तर मिला कि, "आर्य्ये, बरबस, बना न दो मुझको त्यागी,
आर्य-चरण-सेवा में समझो, मुझको भी अपना भागी॥"

"क्या कर्तव्य यही है भाई?" लक्ष्मण ने सिर झुका लिया,
"आर्य, आपके प्रति इन जन ने, कब कब क्या कर्तव्य किया?"
"प्यार किया है तुमने केवल!" सीता यह कह मुसकाईं,
किन्तु राम की उज्जवल आँखें, सफल सीप-सी भर आईं॥

चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से,
मानों झीम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥

पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,
जिसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर वीर निर्भीकमना,
जाग रहा यह कौन धनुर्धर, जब कि भुवन भर सोता है?
भोगी कुसुमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है॥


किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये,
राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये।
बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है,
जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है!

मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने, स्वामि-संग जो आई है,
तीन लोक की लक्ष्मी ने यह, कुटी आज अपनाई है।
वीर-वंश की लाज यही है, फिर क्यों वीर न हो प्रहरी,
विजन देश है निशा शेष है, निशाचरी माया ठहरी॥

कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता;
आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता।
बीच-बीच मे इधर-उधर निज दृष्टि डालकर मोदमयी,
मन ही मन बातें करता है, धीर धनुर्धर नई नई-

क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा;
है स्वच्छन्द-सुमंद गंधवह, निरानंद है कौन दिशा?
बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप,
पर कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप!

है बिखेर देती वसुंधरा, मोती, सबके सोने पर,
रवि बटोर लेता है उनको, सदा सवेरा होने पर।
और विरामदायिनी अपनी, संध्या को दे जाता है,
शून्य श्याम-तनु जिससे उसका, नया रूप झलकाता है।

सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है,
अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है!
अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है,
पर बूढों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥

तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके, पर है मानो कल की बात,
वन को आते देख हमें जब, आर्त्त अचेत हुए थे तात।
अब वह समय निकट ही है जब, अवधि पूर्ण होगी वन की।
किन्तु प्राप्ति होगी इस जन को, इससे बढ़कर किस धन की!

और आर्य को, राज्य-भार तो, वे प्रजार्थ ही धारेंगे,
व्यस्त रहेंगे, हम सब को भी, मानो विवश विसारेंगे।
कर विचार लोकोपकार का, हमें न इससे होगा शोक;
पर अपना हित आप नहीं क्या, कर सकता है यह नरलोक!

मझली माँ ने क्या समझा था, कि मैं राजमाता हूँगी,
निर्वासित कर आर्य राम को, अपनी जड़ें जमा लूँगी।
चित्रकूट में किन्तु उसे ही, देख स्वयं करुणा थकती,
उसे देखते थे सब, वह थी, निज को ही न देख सकती॥

अहो! राजमातृत्व यही था, हुए भरत भी सब त्यागी।
पर सौ सो सम्राटों से भी, हैं सचमुच वे बड़भागी।
एक राज्य का मूढ़ जगत ने, कितना महा मूल्य रक्खा,
हमको तो मानो वन में ही, है विश्वानुकूल रक्खा॥

होता यदि राजत्व मात्र ही, लक्ष्य हमारे जीवन का,
तो क्यों अपने पूर्वज उसको, छोड़ मार्ग लेते वन का?
परिवर्तन ही यदि उन्नति है, तो हम बढ़ते जाते हैं,
किन्तु मुझे तो सीधे-सच्चे, पूर्व-भाव ही भाते हैं॥

जो हो, जहाँ आर्य रहते हैं, वहीं राज्य वे करते हैं,
उनके शासन में वनचारी, सब स्वच्छन्द विहरते हैं।
रखते हैं सयत्न हम पुर में, जिन्हें पींजरों में कर बन्द;
वे पशु-पक्षी भाभी से हैं, हिले यहाँ स्वयमपि, सानन्द!

करते हैं हम पतित जनों में, बहुधा पशुता का आरोप;
करता है पशु वर्ग किन्तु क्या, निज निसर्ग नियमों का लोप?
मैं मनुष्यता को सुरत्व की, जननी भी कह सकता हूँ,
किन्तु पतित को पशु कहना भी, कभी नहीं सह सकता हूँ॥

आ आकर विचित्र पशु-पक्षी, यहाँ बिताते दोपहरी,
भाभी भोजन देतीं उनको, पंचवटी छाया गहरी।
चारु चपल बालक ज्यों मिलकर, माँ को घेर खिझाते हैं,
खेल-खिलाकर भी आर्य्या को, वे सब यहाँ रिझाते हैं!

गोदावरी नदी का तट यह, ताल दे रहा है अब भी,
चंचल-जल कल-कल कर मानो, तान दे रहा है अब भी!
नाच रहे हैं अब भी पत्ते, मन-से सुमन महकते हैं,
चन्द्र और नक्षत्र ललककर, लालच भरे लहकते हैं॥
वैतालिक विहंग भाभी के, सम्प्रति ध्यान लग्न-से हैं,
नये गान की रचना में वे, कवि-कुल तुल्य मग्न-से हैं।
बीच-बीच में नर्तक केकी, मानो यह कह देता है--
मैं तो प्रस्तुत हूँ देखें कल, कौन बड़ाई लेता है॥

आँखों के आगे हरियाली, रहती है हर घड़ी यहाँ,
जहाँ तहाँ झाड़ी में झिरती, है झरनों की झड़ी यहाँ।
वन की एक एक हिमकणिका, जैसी सरस और शुचि है,

क्या सौ-सौ नागरिक जनों की, वैसी विमल रम्य रुचि है?

मुनियों का सत्संग यहाँ है, जिन्हें हुआ है तत्व-ज्ञान,
सुनने को मिलते हैं उनसे, नित्य नये अनुपम आख्यान।
जितने कष्ट-कण्टकों में है, जिनका जीवन-सुमन खिला,
गौरव गन्ध उन्हें उतना ही, अत्र तत्र सर्वत्र मिला।

शुभ सिद्धान्त वाक्य पढ़ते हैं, शुक-सारी भी आश्रम के,
मुनि कन्याएँ यश गाती हैं, क्या ही पुण्य-पराक्रम के।
अहा! आर्य्य के विपिन राज्य में, सुखपूर्वक सब जीते हैं,
सिंह और मृग एक घाट पर, आकर पानी पीते हैं।

गुह, निषाद, शवरों तक का मन, रखते हैं प्रभु कानन में,
क्या ही सरल वचन रहते हैं, इनके भोले आनन में!
इन्हें समाज नीच कहता है, पर हैं ये भी तो प्राणी,
इनमें भी मन और भाव हैं, किन्तु नहीं वैसी वाणी॥

कभी विपिन में हमें व्यंजन का, पड़ता नहीं प्रयोजन है,
निर्मल जल मधु कन्द, मूल, फल-आयोजनमय भोजन हैं।
मनःप्रसाद चाहिए केवल, क्या कुटीर फिर क्या प्रासाद?
भाभी का आह्लाद अतुल है, मँझली माँ का विपुल विषाद!

अपने पौधों में जब भाभी, भर-भर पानी देती हैं,
खुरपी लेकर आप निरातीं, जब वे अपनी खेती हैं,
पाती हैं तब कितना गौरव, कितना सुख, कितना सन्तोष!
स्वावलम्ब की एक झलक पर, न्योछावर कुबेर का कोष॥

सांसारिकता में मिलती है, यहाँ निराली निस्पृहता,
अत्रि और अनुसूया की-सी होगी कहाँ पुण्य-गृहता!
मानो है यह भुवन भिन्न ही, कृतिमता का काम नहीं;
प्रकृति अधिष्ठात्री है इसकी, कहीं विकृति का नाम नहीं॥

स्वजनों की चिन्ता है हमको, होगा उन्हें हमारा सोच,
यही एक इस विपिन-वास में, दोनों ओर रहा संकोच।
सब सह सकता है, परोक्ष ही, कभी नहीं सह सकता प्रेम,
बस, प्रत्यक्ष भाव में उसका, रक्षित-सा रहता है क्षेम॥

इच्छा होती है स्वजनों को, एक बार वन ले आऊँ,
और यहाँ की अनुपम महिमा, उन्हें घुमाकर दिखलाऊँ।
विस्मित होंगे देख आर्य्य को, वे घर की ही भाँति प्रसन्न,
मानों वन-विहार में रत हैं, वे वैसे ही श्रीसम्पन्न॥

यदि बाधाएँ हुईं हमें तो, उन बाधाओं के ही साथ,
जिससे बाधा-बोध न हो, वह सहनशक्ति भी आई हाथ।
जब बाधाएँ न भी रहेंगी, तब भी शक्ति रहेगी यह,
पुर में जाने पर भी वन की, स्मृति अनुरक्ति रहेगी यह॥

नहीं जानती हाय! हमारी, माताएँ आमोद-प्रमोद,
मिली हमें है कितनी कोमल, कितनी बड़ी प्रकृति की गोद।
इसी खेल को कहते हैं क्या, विद्वज्जन जीवन-संग्राम?
तो इसमें सुनाम कर लेना, है कितना साधारण काम!

"बेचारी उर्मिला हमारे, लिए व्यर्थ रोती होगी,
क्या जाने वह, हम सब वन में, होंगे इतने सुख-भोगी।"
मग्न हुए सौमित्रि चित्र-सम, नेत्र निमीलित एक निमेष,
फिर आँखें खोलें तो यह क्या, अनुपम रूप, अलौकिक वेश!

चकाचौंध-सी लगी देखकर, प्रखर ज्योति की वह ज्वाला,
निस्संकोच, खड़ी थी सम्मुख, एक हास्यवदनी बाला!
रत्नाभरण भरे अंगो में, ऐसे सुन्दर लगते थे--
ज्यों प्रफुल्ल बल्ली पर सौ सौ, जुगनूँ जगमग जगते थे!

थी अत्यन्त अतृप्त वासना, दीर्घ दृगों से झलक रही,
कमलों की मकरन्द-मधुरिमा, मानो छवि से छलक रही।
किन्तु दृष्टि थी जिसे खोजती, मानो उसे पा चुकी थी,
भूली-भटकी मृगी अन्त में अपनी ठौर आ चुकी थी॥

कटि के नीचे चिकुर-जाल में, उलझ रहा था बायाँ हाथ,
खेल रहा हो ज्यों लहरों से, लोल कमल भौरों के साथ।
दायाँ हाथ इस लिए था सुरभित--चित्र-विचित्र-सुमन-माला,
टाँगा धनुष कि कल्पलता पर, मनसिज ने झूला डाला!

पर सन्देह-दोल पर ही था, लक्ष्मण का मन झूल रहा,
भटक भावनाओं के भ्रम में, भीतर ही था भूल रहा।
पड़े विचार-चक्र में थे वे, कहाँ न जाने कूल रहा;
आज जागरित-स्वप्न-शाल यह, सम्मुख कैसा फूल रहा!

देख उन्हें विस्मित विशेष वह, सुस्मितवदनी ही बोली-
(रमणी की मूरत मनोज्ञ थी, किन्तु न थी सूरत भोली)
"शूरवीर होकर अबला को, देख सुभग, तुम थकित हुए;
संसृति की स्वाभाविकता पर, चंचल होकर चकित हुए!

प्रथम बोलना पड़ा मुझे ही, पूछी तुमने बात नहीं,
इससे पुरुषों की निर्ममता, होती क्या प्रतिभास नहीं?"
सँभल गये थे अब तक लक्ष्मण, वे थोड़े से मुसकाये,
उत्तर देते हुए उसे फिर, निज गम्भीर भाव लाये-

"सुन्दरि, मैं सचमुच विस्मित हूँ, तुमको सहसा देख यहाँ,
ढलती रात, अकेली बाला, निकल पड़ी तुम कौन कहाँ?
पर अबला कहकर अपने को, तुम प्रगल्भता रखती हो,
निर्ममता निरीह पुरुषों में, निस्सन्देह निरखती हो!
पर मैं ही यदि परनारी से, पहले संभाषण करता,
तो छिन जाती आज कदाचित् पुरुषों की सुधर्मपरता।
 


जो हो, पर मेरे बारे में, बात तुम्हारी सच्ची है,
चण्डि, क्या कहूँ, तुमसे, मेरी, ममता कितनी कच्ची है॥

माता, पिता और पत्नी की, धन की, धरा-धाम की भी,
मुझे न कुछ भी ममता व्यापी, जीवन परम्परा की भी,
एक-किन्तु उन बातों से क्या, फिर भी हूँ मैं परम सुखी,
ममता तो महिलाओं में ही, होती है हे मंजुमुखी॥

शूरवीर कहकर भी मुझको, तुम जो भीरु बताती हो,
इससे सूक्ष्मदर्शिता ही तुम, अपनी मुझे जताती हो?
भाषण-भंगी देख तुम्हारी, हाँ, मुझको भय होता है,
प्रमदे, तुम्हें देख वन में यों, मन में संशय होता है॥

कहूँ मानवी यदि मैं तुमको, तो वैसा संकोच कहाँ?
कहूँ दानवी तो उसमें है, यह लावण्य कि लोच कहाँ?
वनदेवी समझूँ तो वह तो, होती है भोली-भाली,
तुम्हीं बताओ कि तुम कौन हो, हे रंजित रहस्यवाली?"

"केवल इतना कि तुम कौन हो", बोली वह-"हा निष्ठुर कान्त!"
यह भी नहीं-"चाहती हो क्या, कैसे हो मेरा मन शान्त?"
"मुझे जान पड़ता है तुमसे, आज छली जाऊँगी मैं;
किन्तु आ गई हूँ जब तब क्या, सहज चली जाऊँगी मैं।

समझो मुझे अतिथि ही अपना, कुछ आतिथ्य मिलेगा क्या?
पत्थर पिघले, किन्तु तुम्हारा, तब भी हृदय हिलेगा क्या?"
किया अधर-दंशन रमणी ने, लक्ष्मण फिर भी मुसकाये,
मुसकाकर ही बोले उससे--"हे शुभ मूर्तिमयी माये!

तुम अनुपम ऐशर्य्यवती हो, एक अकिंचन जन हूँ मैं;
क्या आतिथ्य करूँ, लज्जित हूँ, वन-वासी, निर्धन हूँ मैं।"
रमणी नि फिर कहा कि "मैंने, भाव तुम्हारा जान लिया,
जो धन तुम्हें दिया है विधि ने, देवों को भी नहीं दिया!

किन्तु विराग भाव धारणकर, बने स्वयं यदि तुम त्यागी,
तो ये रत्नाभरण वार दूँ, तुम पर मैं हे बड़भागी!
धारण करूँ योग तुम-सा ही, भोग-लालसा के कारण,
पर कर सकती हूँ मैं यों ही, विपुल-विघ्न-बाधा वारण॥

इस व्रत में किस इच्छा से तुम, व्रती हुए हो, बतलाओ?
मुझमें वह सामर्थ्य है कि तुम, जो चाहो सो सब पाओ।
धन की इच्छा हो तुमको तो, सोने का मेरा भू-भाग,
शासक, भूप बनो तुम उसके, त्यागो यह अति विषम विराग॥

और किसी दुर्जय वैरी से, लेना है तुमको प्रतिशोध,
तो आज्ञा दो, उसे जला दे, कालानल-सा मेरा क्रोध,
प्रेम-पिपासु किसी कान्ता के, तपस्कूप यदि खनते हो,
सचमुच ही तुम भोले हो, क्यों मन को यों हनते हो?
अरे, कौन है, वार न देगी, जो इस यौवन-धन पर प्राण?
खाओ इसे न यों ही हा हा, करो यत्न से इसका त्राण।
किसी हेतु संसार भार-सा, देता हो यदि तुमको ग्लानि,
तो अब मेरे साथ उसे तुम, एक और अवसर दो दानि!"

लक्ष्मण फिर गम्भीर हो गये, बोले--"धन्यवाद धन्ये!
ललना सुलभ सहानुभूति है, निश्चय तुममें नृपकन्ये!
साधारण रमणी कर सकती, है ऐसे प्रस्ताव कहीं?
पर मैं तुमसे सच कहता हूँ कोई मुझे अभाव नहीं॥"

"तो फिर क्या निष्काम तपस्या, करते हो तुम इस वय में?
पर क्या पाप न होगा तुमको, आश्रम के धर्म्मक्षय में?
मान लो कि वह न हो, किन्तु इस, तप का फल तो होगा ही,
फिर वह स्वयं प्राप्त भी तुमसे, क्या न जायगा भोगा ही?

वृक्ष लगाने की ही इच्छा, कितने ही जन रखते हैं,
पर उनमें जो फल लगते हैं, क्या वे उन्हें न चखते हैं?"
लक्ष्मण अब हँस पड़े और यों, कहने लगे--"दुहाई है!
सेंतमेंत की तापस पदवी, मैंने तुमसे पाई है॥

यों ही यदि तप का फल पाऊँ, तो मैं इसे न चक्खूँगा,
तुमसे जन के लिए यत्न से, उसको रक्षित रक्खूँगा।"
हँसी सुन्दरी भी, फिर बोली-"यदि वह फल मैं ही होऊँ,
तो क्या करो, बताओ? बस अब, क्यों अमूल्य अवसर खोऊँ?"

"तो मैं योग्य पात्र खोजूँगा, सहज परन्तु नहीं यह काम,"
"मैंने खोज लिया है उसको, यद्यपि नहीं जानती नाम।
फिर भी वह मेरे समक्ष है", चौंके लक्ष्मण, बोले--"कौन?"
"केवल तुम" कहकर रमणी भी, हुई तनिक लज्जित हो मौन॥

"पाप शान्त हो, पाप शान्त हो, कि मैं विवाहित हूँ बाले!"
"पर क्या पुरुष नहीं होते हैं, दो-दो दाराओं वाले?
नर कृत शास्त्रों के सब बन्धन, हैं नारी को ही लेकर,
अपने लिए सभी सुविधाएँ, पहले ही कर बैठे नर!"

"तो नारियाँ शास्त्र रचना पर, क्या बहु पति का करें विधान?
पर उनके सतीत्व-गौरव का, करते हैं नर ही गुणगान।
मेरे मत में एक और हैं, शास्त्रों की विधियाँ सारी,
अपना अन्तःकरण आप है, आचारों का सुविचारी॥

नारी के जिस भव्य-भाव का, साभिमान भाषी हूँ मैं,
उसे नरों में भी पाने का, उत्सुक अभिलाषी हूँ मैं।
बहुविवाह-विभ्राट, क्या कहूँ, भद्रे, मुझको क्षमा करो;
तुम कुशला हो, किसी कृती को, करो कहीं कृत्कृत्य, वरो।"

"पर किस मन से वरूँ किसी को? वह तो तुम से हरा गया!"
"चोरी का अपराध और भी, लो यह मुझ पर धरा गया?"
"झूठा?" प्रश्न किया प्रमदा ने, और कहा--"मेरा मन हाय!
निकल गया है मेरे कर से, होकर विवश, विकल, निरुपाय!

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