आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं - डॉ. दयाराम आलोक की कालजयी रचना
नक्षत्रों की ज्योति, मेघ का मुक्त हास धरती पर लाएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
दीपावली केवल दीपों का पर्व नहीं, यह अंधकार पर प्रकाश की विजय का पर्व है। जब पूरा संसार जगमग दीपों की चकाचौंध में डूबा होता है, तब कवि की दृष्टि उन अश्रुपूर्ण लोचनों पर भी जाती है, जो वैभव के बीच भी अभाव में जी रहे हैं।
जयपुर के प्रतिष्ठित समाचार पत्र "नवज्योति" में प्रकाशित डॉ. दयाराम आलोक की यह कालजयी रचना हमें केवल बाहर की सुंदरता नहीं, बल्कि अंतर की आँखें खोलने का आह्वान करती है। यह कविता घृणा, ग्लानि और ईर्ष्या को स्नेह, सत्य और समता से धोने का संदेश देती है।
इस रचना में कवि ने दीपावली के सच्चे अर्थ को समझाया है - ऐसा दीप जलाना जिससे किसी मजबूर का दिल न तड़पे, बल्कि बर्बाद हुई खुशियों को नया जीवन मिले। दयानंद और सुकरात जैसे महापुरुषों को दीप बताकर कवि ने इस प्रकाश पर्व को एक शाश्वत सद्भाव का पर्व बना दिया है।
आइए, इस पावन प्रकाश वेला में इस अनुपम रचना का पूर्ण पाठ करते हैं और अपने मन के दर्पण को स्वच्छ बनाते हैं।
पूरी कविता :
आओ दीप जलाकर...
नक्षत्रों की ज्योति मेघ का मुक्त हास धरती पर लाएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
युग बीते जग देख रहा है चकाचौंध जगमग दीवाली,
युद्ध द्रश्य है इधर ज्योति और उधर तिमिर मावस मतवाली।
नष्ट करो मालिन्य प्रसारो उज्वलता जगती ने जाना,
शृंगारित घर आंगन गलियां हुआ नयन रंजक वीराना।
अंधियारे के अधिवासों पर आओ दीप शिखा लहराएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
बाहर की सुन्दरता देखी अब अंतर की आंखे खोलो
घृणा, ग्लानि, ईर्षा, दुर्गुण सब स्नेह, सत्य, समता से धोलो।
दीवाली का रूप हो जिसमें हर अभाव वैभव को छूले,
सम्प्रदाय-विद्वेष, ढोंग और कलुशित वर्ग विषमता भूलें।
यह प्रकाश वेला अति पावन सौहार्द्रिक सद्भाव जगाएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
ज्योतित जग में आज निहारो अश्रुपूर्ण लोचन कितने हैं,
वैभव के पोषक बेचारे दलित, क्षुधित पंजर कितने हैं।
हम न विचारें ऐसे मसले तब तक यह दीपक मेला है,
विस्फ़ोटक द्रव्यों से मानव खुश किन्तु प्रलय झेला है।
दयानंद, सुकरात दीप हैं जो सदियों तक राह दिखाएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
तुम मत ऐसे दीप जलाओ जिससे अंधकार उकसाए,
लुत्फ़ उठाना ठीक नहीं जो मजबूरों के दिल तडफ़ाए।
उन्हें मनाने दो दीवाली जिन्हें न खुशियां रास हुई हैं,
उन खुशियों को जीवन दे दो जो खुशियां बर्बाद हुई हैं।
ज्योति पर्व आवाहन करता जन मन दर्पण स्वच्छ बनाएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
नक्षत्रों की ज्योति, मेघ का मुक्त हास धरती पर लाएं...
निष्कर्ष (Conclusion)
डॉ. दयाराम आलोक की यह रचना हमें सिखाती है कि दीपावली का असली अर्थ केवल अपने घर को सजाना नहीं है, बल्कि दूसरों के जीवन में प्रकाश फैलाना है।
कवि का संदेश स्पष्ट है - जब तक समाज का एक भी व्यक्ति अंधेरे में है, तब तक हमारी दीवाली अधूरी है। हमें ऐसा दीप जलाना है जो नफरत को मिटाए, समता को बढ़ाए और हर मन को सौहार्द से भर दे।
यही इस कविता की कालजयीता है। दशकों बाद भी यह रचना आज उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी नवज्योति में प्रकाशन के समय थी।
इस दीपावली, आइए हम सब मिलकर एक ऐसा दीप जलाएं जो किसी के जीवन में अंधेरा न बढ़ाए, बल्कि मंगलमय सद्पथ दिखलाए।
आपको यह रचना कैसी लगी? कमेंट में अपने विचार अवश्य बताएं और इस संदेश को अपने अपनों तक पहुंचाएं।
लेखक परिचय
डॉ. दयाराम आलोक हिन्दी साहित्य के एक प्रतिष्ठित कवि, साहित्यकार और विचारक हैं। उनकी रचनाओं में समाज, मानवता, सद्भाव और राष्ट्रीय चेतना का गहरा स्वर देखने को मिलता है।
सरल भाषा में गूढ़ दार्शनिक संदेश देना उनकी कविताओं की विशेषता है। उनकी रचनाएं देश के विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं, जिनमें जयपुर से प्रकाशित "नवज्योति" भी प्रमुख है। डॉ. आलोक की कविताएं पाठकों को केवल आनंद ही नहीं देतीं, बल्कि उन्हें आत्मचिंतन और समाज के प्रति अपने कर्तव्य का बोध भी कराती हैं।
नक्षत्रों की ज्योति मेघ का मुक्त हास धरती पर लाएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
युग बीते जग देख रहा है चकाचौंध जगमग दीवाली,
युद्ध द्रश्य है इधर ज्योति और उधर तिमिर मावस मतवाली।
नष्ट करो मालिन्य प्रसारो उज्वलता जगती ने जाना,
शृंगारित घर आंगन गलियां हुआ नयन रंजक वीराना।
अंधियारे के अधिवासों पर आओ दीप शिखा लहराएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
बाहर की सुन्दरता देखी अब अंतर की आंखे खोलो
घृणा, ग्लानि, ईर्षा, दुर्गुण सब स्नेह, सत्य, समता से धोलो।
दीवाली का रूप हो जिसमें हर अभाव वैभव को छूले,
सम्प्रदाय-विद्वेष, ढोंग और कलुशित वर्ग विषमता भूलें।
यह प्रकाश वेला अति पावन सौहार्द्रिक सद्भाव जगाएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
ज्योतित जग में आज निहारो अश्रुपूर्ण लोचन कितने हैं,
वैभव के पोषक बेचारे दलित, क्षुधित पंजर कितने हैं।
हम न विचारें ऐसे मसले तब तक यह दीपक मेला है,
विस्फ़ोटक द्रव्यों से मानव खुश किन्तु प्रलय झेला है।
दयानंद, सुकरात दीप हैं जो सदियों तक राह दिखाएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
तुम मत ऐसे दीप जलाओ जिससे अंधकार उकसाए,
लुत्फ़ उठाना ठीक नहीं जो मजबूरों के दिल तडफ़ाए।
उन्हें मनाने दो दीवाली जिन्हें न खुशियां रास हुई हैं,
उन खुशियों को जीवन दे दो जो खुशियां बर्बाद हुई हैं।
ज्योति पर्व आवाहन करता जन मन दर्पण स्वच्छ बनाएं,
आओ दीप जलाकर जग को मंगलमय सद्पथ दिखलाएं।
नक्षत्रों की ज्योति, मेघ का मुक्त हास धरती पर लाएं...
निष्कर्ष (Conclusion)
डॉ. दयाराम आलोक की यह रचना हमें सिखाती है कि दीपावली का असली अर्थ केवल अपने घर को सजाना नहीं है, बल्कि दूसरों के जीवन में प्रकाश फैलाना है।
कवि का संदेश स्पष्ट है - जब तक समाज का एक भी व्यक्ति अंधेरे में है, तब तक हमारी दीवाली अधूरी है। हमें ऐसा दीप जलाना है जो नफरत को मिटाए, समता को बढ़ाए और हर मन को सौहार्द से भर दे।
यही इस कविता की कालजयीता है। दशकों बाद भी यह रचना आज उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी नवज्योति में प्रकाशन के समय थी।
इस दीपावली, आइए हम सब मिलकर एक ऐसा दीप जलाएं जो किसी के जीवन में अंधेरा न बढ़ाए, बल्कि मंगलमय सद्पथ दिखलाए।
आपको यह रचना कैसी लगी? कमेंट में अपने विचार अवश्य बताएं और इस संदेश को अपने अपनों तक पहुंचाएं।
लेखक परिचय
डॉ. दयाराम आलोक हिन्दी साहित्य के एक प्रतिष्ठित कवि, साहित्यकार और विचारक हैं। उनकी रचनाओं में समाज, मानवता, सद्भाव और राष्ट्रीय चेतना का गहरा स्वर देखने को मिलता है।
सरल भाषा में गूढ़ दार्शनिक संदेश देना उनकी कविताओं की विशेषता है। उनकी रचनाएं देश के विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं, जिनमें जयपुर से प्रकाशित "नवज्योति" भी प्रमुख है। डॉ. आलोक की कविताएं पाठकों को केवल आनंद ही नहीं देतीं, बल्कि उन्हें आत्मचिंतन और समाज के प्रति अपने कर्तव्य का बोध भी कराती हैं।

