26 सितंबर 2016

panchvati poem -Maithili Sharan Gupt पंचवटी कविता - मैथिली शरण गुप्त

panchvati poem 
-Maithili Sharan Gupt 
पंचवटी   कविता 
- मैथिली शरण गुप्त 


चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से,
मानों झूम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥
पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,
जिसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर-वीर निर्भीकमना,
जाग रहा यह कौन धनुर्धर, जब कि भुवन भर सोता है?
भोगी कुसुमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है॥


किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये,
राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये।
बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है,
जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है॥
मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने, स्वामि-संग जो आई है,
तीन लोक की लक्ष्मी ने यह, कुटी आज अपनाई है।
वीर-वंश की लाज यही है, फिर क्यों वीर न हो प्रहरी,
विजन देश है निशा शेष है, निशाचरी माया ठहरी॥
कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता;
आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता।
बीच-बीच मे इधर-उधर निज दृष्टि डालकर मोदमयी,
मन ही मन बातें करता है, धीर धनुर्धर नई नई॥


क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा;
है स्वच्छन्द-सुमंद गंध वह, निरानंद है कौन दिशा?
बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप,
पर कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप॥
है बिखेर देती वसुंधरा, मोती, सबके सोने पर,
रवि बटोर लेता है उनको, सदा सवेरा होने पर।
और विरामदायिनी अपनी, संध्या को दे जाता है,
शून्य श्याम-तनु जिससे उसका, नया रूप झलकाता है॥
सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है,
अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है।
अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है,
पर बूढों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥
तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके, पर है मानो कल की बात,


वन को आते देख हमें जब, आर्त्त अचेत हुए थे तात।
अब वह समय निकट ही है जब, अवधि पूर्ण होगी वन की।
किन्तु प्राप्ति होगी इस जन को, इससे बढ़कर किस धन की॥
और आर्य को, राज्य-भार तो, वे प्रजार्थ ही धारेंगे,
व्यस्त रहेंगे, हम सब को भी, मानो विवश विसारेंगे।
कर विचार लोकोपकार का, हमें न इससे होगा शोक;
पर अपना हित आप नहीं क्या, कर सकता है यह नरलोक॥

22 सितंबर 2016

हास्य कवि सम्मेलन hasya kavi sammelan



हास्य कवि सम्मेलन 
 hasya kavi sammelan



21 सितंबर 2016

वे मुसकाते फूल- कविता - महादेवी वर्मा



                                                         -महादेवी  वर्मा 

वे मुसकाते फूल, नहीं
जिनको आता है मुरझाना
वे तारों के दीप, नहीं
जिनको आता है बुझ जाना।

वे नीलम के मेघ, नहीं
जिनको है घुल जाने की चाह
वह अनंत ऋतुराज, नहीं
जिसने देखी जाने की राह

वे सूने से नयन, नहीं
जिनमें बनते आंसू मोती
वह प्राणों की सेज, नहीं
जिसमें बेसुध पीड़ा सोती।

ऐसा तेरा लोक, वेदना नहीं
नहीं जिसमें अवसाद,
जलना जाना नहीं,
नहीं जिसने जाना मिटने का स्वाद।

क्या अमरों का लोक मिलेगा
तेरी करुणा का उपहार?
रहने दो हे देव! अरे
यह मेरे मिटने का अधिकार।

मुरझाया फूल - महादेवी वर्मा

मुरझाया फूल 
- महादेवी वर्मा



था कली के रूप शैशव में अहो सूखे सुमन
हास्य करता था, खिलाती अंक में तुझको पवन
खिल गया जब पूर्ण तू मंजुल, सुकोमल पुष्पवर
लुब्ध मधु के हेतु मंडराते लगे आने भ्रमर।



स्निग्ध किरणें चंद्र की तुझको हंसाती थी सदा
रात तुझ पर वारती थी मोतियों की संपदा
लोरियां गाकर मधुप निद्रा-विवश करते तुझे
यत्न माली कर रहा आनंद से भरता तुझे।



कर रहा अठखेलियाँ इतरा सदा उद्यान में
अंत का यह दृष्य आया था कभी क्या ध्यान में?
सो रहा अब तू धरा पर शुष्क बिखराया हुआ
गंध कोमलता नहीं मुख मंजु मुरझाया हुआ।



आज तुझको देख चाहक भ्रमर आता नहीं
लाल अपना राग तुझ पर प्रात बरसाता नहीं
जिस पवन ने अंक में ले प्यार तुझको था किया
तीव्र झोंकों से सुला उसने तुझे भू पर दिया।



कर दिया मधु और सौरभ दान सारा एक दिन
किन्तु रोता कौन है तेरे लिए दानी सुमन
मत व्यथित हो फूल, सुख किसको दिया संसार ने
स्वार्थमय सबको बनाया है यहाँ करतार ने



विश्व में हे फूल तू सबके हृदय भाता रहा
दान कर सर्वस्व फिर भी हाय! हर्षाता रहा
जब न तेरी ही दशा पर दुख हुआ संसार को
कौन रोएगा सुमन! हम से मनुज नि:सार को।

तुम सो जाओ मैं गाऊँ - महादेवी वर्मा


तुम सो जाओ मैं गाऊँ
- महादेवी वर्मा




मैं गाऊँ तुम सो जाओ
सुख सपनों में खो जाओ
माना आज की रात है लम्बी
माना दिन था भारी
पर जग बदला बदलेगी
एक दिन तक़दीर हमारी
उस दिन के ख्वाब सजाओ

कल तुम जब आँखें खोलोगे
जब होगा उजियारा
खुशियों का सन्देशा लेकर
आएगा सवेरा प्यारा
मत आस के दीप बुझाओ,
मैं गाऊँ ...

जी करता है जीते जी
मैं यूँ ही गाता जाऊं
गर्दिश में थके हाथों का
माथा सहलाता जाऊं
फिर इक दिन तुम दोहराओ,
सुख सपनों ...

Swatantrata Pukarti स्वतन्त्रता पुकारती - जय शंकर प्रसाद का व्यक्तित्व व कृतित्व

Swatantrata Pukarti 
 स्वतन्त्रता पुकारती 
जय शंकर प्रसाद का व्यक्तित्व व कृतित्व 
हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती
'अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!'

असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी
सपूत मातृभूमि के- रुको न शूर साहसी!
अराति सैन्य सिंधु में, सुवाड़वाग्नि से जलो,
प्रवीर हो जयी बनो - बढ़े चलो, बढ़े चलो!

जय शंकर प्रसाद की कविताएं - विडियो



जय शंकर प्रसाद की कविताएं 
आवाज- शाम किशोर
- विडियो


अरुण यह मधुमय देश हमारा -जय शंकर प्रसाद

अरुण यह मधुमय देश हमारा
                             -जय शंकर प्रसाद 

अरुण यह मधुमय देश
अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा।

सरस तामरस गर्भ विभा पर
नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर
मंगल कुंकुम सारा।।

लघु सुरधनु से पंख पसारे
शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए
समझ नीड़ निज प्यारा।।

बरसाती आँखों के बादल
बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनंत की
पाकर जहाँ किनारा।।

हेम कुंभ ले उषा सवेरे
भरती ढुलकाती सुख मेरे।
मदिर ऊँघते रहते जब

जग कर रजनी भर तारा।



20 सितंबर 2016

जीवन नहीं मरा करता है -गोपाल दास नीरज

जीवन नहीं मरा करता है,
गोपाल दास नीरज,,
छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ लुटाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है

सपना क्या है, नयन सेज पर सोया हुई आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से सावन नहीं मरा करता है

माला बिखर गई तो क्या है, ख़ुद ही हल हो गई समस्या
आँसू ग़र नीलाम हुए तो, समझो पूरी हुई तपस्या
रूठे दिवस मनाने वालों, फ़टी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आंगन नहीं मरा करता है

लाखों बार गगरियाँ फूटीं, शिक़न नहीं आई पनघट पर
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं, चहल-पहल वो ही है तट पर
तम की उमर बढ़ाने वालों, लौ की आयु घटाने वालों
लाख करे पतझड़ क़ोशिश पर उपवन नहीं मरा करता है

लूट लिया माली ने उपवन, लुटी न लेकिन गंध फूल की
तूफ़ानों तक ने छेड़ा पर, खिड़की बंद न हुई धूल की
नफ़रत गले लगाने वालों, सब पर धूल उड़ाने वालों
कुछ मुखड़ों की नाराज़ी से, दर्पण नहीं मरा करता है

16 सितंबर 2016

जय अखंड भारत / आरसी प्रसाद सिंह



शक्ति ऐसी है नहीं संसार में कोई कहीं पर, जो हमारे देश की राष्ट्रीयता को अस्त कर दे ।
ध्वान्त कोई है नहीं आकाश में ऐसा विरोधी, जो हमारी एकता के सूर्य को विध्वस्त कर दे !

राष्ट्र की सीमांत रेखाएँ नहीं हैं बालकों के खेल का कोई घरौंदा, पाँव से जिसको मिटा दे ।
देश की स्वाधीनता सीता सुरक्षित है, किसी दश-कंठ का साहस नहीं, ऊँगली कभी उसपर उठा दे ।

देश पूरा एक दिन हुंकार भी समवेत कर दे, तो सभी आतंकवादियों का बगुला टूट जाए ।
किन्तु, ऐसा शील भी क्या, देखता सहता रहे जो आततायी मातृ-मंदिर की धरोहर लूट जाए ।

रोग, पावक, पाप, रिपु प्रारंभ में लघु हों भले ही किन्तु, वे ही अंत में दुर्दम्य हो जाते उमड़कर ।
पूर्व इस भय के की वातावरण में विष फैल जाए, विषधरों के विष उगलते दंश को रख दो कुचलकर ।

झेलते तूफ़ान ऐसे सैकड़ो आए युगों से, हम इसे भी ऐतिहासिक भूमिका में झेल लेंगे ।
किन्तु, बर्बर और कायरता कलंकित कारनामों की पुनरावृति को निश्चेष्ट होकर हम सहेंगे ।

एक गीत बसंत के स्वागतार्थ --डॉ. अली अहमद अब्बास उम्मीद

फिर बसंत आया नये रंगों की सौगात लिये
सुर्खरू हो के पलट आया है ऋतु का लश्कर
शोख मौसम के कदम चूम रहे हैं पत्थर
सर्द मैदान में शब ने लगाया बिस्तर
खुश्क माहौल ने ओढ़ी है बसंती चादर
भूरी शाखों से नये फूल गले मिलते हैं।
दूर तक शोर है ख़्वाबों के कंवल खिलते हैं

यूँ तो हर पल है नए रंगों की सौगात लिए,
फिर भी धुँधले हैं मेरी जागती आंखों के दिये
लोग मदहोश हैं अब ज़ख्मे-जिगर कौन सिये

मैं कि शायर हूँ मेरी आँख में वो फूल भी हैं
जिनके रंगों ने हर एक राह को गुलनार किया
बदले हालात में शाखों को बहुत प्यार किया
दाम लगते थे मगर बिकने से इनकार किया

हाँ वही फूल जो रौशन थे सहर के मानिन्द
उनकी तक़दीर पे अब शाम की परछाई है

कैसे मानूँ कि बसंत आया है सौगात लिये
वो सभी फूल, वो शाख़ें, वो रविश, वो सबा
जिन ने मौसम की जवानी को दिया अपना लहू
उनके चेहरों पे है बदले हुए हालात की राख
दूर तक शोर है ख़्वाबों के कंवल खिलते हैं!
ये तो बतलाओ नये रंग किधर मिलते हैं!!

फिर बसंत आया नये रंगों की सौगात लिए
धुंधले-धुंधले हैं मेरी जागती आँखों के दिये