4/3/10

सरहदें बुला रहीं.- डॉ॰दयाराम आलोक





नौ जवां बढे चलो वतन की ये पुकार है
वो सरहदें बुला रहीं तुम्हारा इंतजार है।

दुश्मनों को जंग में प्रहार दो शिकस्त दो,
कि जो करे इधर का रुख पकड उसे पछाड दो
बरस पडो क्या खोफ़ है जो शत्रु बेशुमार हैं
वो सरहदें बुला रही तुम्हारा इंतजार है।

दरिन्दे लाल चीन के हिमालया पे छा रहे
लुटेरे पाक के नजर स्वदेश पे गडा रहे
उडा दो उनका सर पडेगा सिर वो ही मजार है
वो सरहदें बुला रही तुम्हारा इंतजार है।

तुम्हारे हर कदम का लक्ष्य दुश्मनों की मौत हो
बढे चलो कि हर कदम नई विजय का स्रोत हो
मिटेगी क्या वो जिन्दगी जो कौम पर निसार है
वो सरहदें बुला रही तुम्हारा इंतजार है।

चलाओ टेंक,तोप,बम फ़टे कि आसमां हिले,
रुको नहीं कि जब तलक न शत्रु को सजा मिले,
तुम्हारे गर्म खून से वतन ,चमन,बहार है
वो सरहदें बुला रहीं तुम्हारा इंतजार है।


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