04 मार्च 2010

प्रणय-गीत- डॉ॰दयाराम आलोक



   


हम तुम गीत प्रणय के गाएं
प्राण-प्राण योवन उमगाएं.

मोह न मन का घटने पाए
मेघ न स्नेहिल छंटने पाएं
हृदय खोल दें इक दूजे पर
उपालंभ झूठलाएं
हम तुम गीत प्रणय के गाएं



ऊर की अभिलाषाएं कुंठित
सृजन-विनाश हुए अनुबंधित
क्षुब्ध उदधि उत्ताल तरंगें
पथ प्रशस्त कर जाएं
हम तुम गीत प्रणय के गाएं

लतिका-विटप ग्रथित बंधन में
विचलित सुमन भ्रमर गुंजन में
हूक न कब तक उठे हृदय में
जब वसंत बौराए.
हम तुम गीत प्रणय के गाएं.


अधर कपोल प्रणय प्रण पालें
चक्षु चकोर नियम अपनालें
सब बंधन शैवाल बह चलें
स्नेह सलिल ढरकाएं
हम तुम गीत प्रणय के गाएं



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12 टिप्‍पणियां:

दर्पण साह 'दर्शन' ने कहा…

कविता की गेयता में घुला प्रणय निवेदन, अमराई की बौर की तरह है.

dilip rathore shamgarh ने कहा…

प्रणय गीत का माधुर्य और इस गीत पर दर्पन साह"दर्शन" जो अपना दर्शन रखा है दोनो ही बहुत अच्छे लगे। सुन्दर काव्य! शुभ कामनाएं!

dr.aalok dayaram ने कहा…
इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
kapil ने कहा…

सुन्दरतम!
"सब बंधन शैवाल बह चलें,
स्नेह सलिल ढरकाएं" पंक्ति प्रभावित कर गई।
बधाई!

ramesh ने कहा…

bahuta sundar kavita. blog jagata men aapaka swaagat hai.

shama ने कहा…

Bahut sundar geet!

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

"अधर कपोल प्रणय प्रण पालें,
चक्छु चकोर नियम अपनालें
sundar rachna wakai me ....

http://athaah.blogspot.com/

बेनामी ने कहा…

nice melody.thanks

rajubhai ने कहा…

जब प्रणय परवान चढेगा तो सब बंधन तो शैवाल की तरह बह ही जाएंगे न । हृदयस्पर्शी रचना। आभार!

kamal mehrotra ने कहा…

डॉ'आलोक जी आपकी रचना पढ़ी बहुत सुंदर लिखी हमारा मार्ग दर्शन कर

सुमन'मीत' ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रणय गीत..............प्रीत रस से सरोबर........

The guy sans voice ने कहा…

achcha laga padhkar!!!!!