04 मार्च 2010

रात और प्रभात.-डॉ॰दयाराम आलोक


दैनिक इन्दौर समाचार के दीपावली विशेषांक सन १९६९ में प्रकाशित कृति-


               *रात  और  प्रभात* 



रात,
भयानक अंधकार है,
कलुषित उद्वेगों का पौषक.
पथिक,
चल रहा डरता-डरता,
कठिन डगर पर धीमे-धीमे.
मंजिल,
दूर नजर आती है
आकर्षक,सुन्दर,मन भावन

दीप,
जल रहा
झिल मिल-झिल मिल,
सघन तिमिर से सतत जूझता.
दीपक की लौ,
कहती-"संभलो,
क्यों दुष्कृत्यों में डूबे हो,
मैं गवाह हूं
देख रही हूं
नग्न कृत्य जो अभी हो रहा."

तिमिर,
कुपित हो उठा
"दिये की ये हिम्मत है?"
अंधड को आदेश
कुचलने का दे डाला.

दीप लडा,
बलिदान हो गया
लीन हो गई उसकी आत्मा,
उस अनंत में

जिसमें लाखों ज्वालाएं हैं
अगणित दीपक मालाएं हैं

अंधकार हंस दिया-
"शत्रु का हुआ सफ़ाया"
आत्म शक्ति से रहित
प्राणियों के घट-घट में
तिमिर प्रतिष्ठित सहज हो गया

.पर यह क्रम
चल सका न लंबा
रवि ने अपना रथ दौडाया,
दुष्ट तिमिर अवसान हो गया
रवि के प्रबल रश्मि अस्त्रों से
जग ने कहा-
"प्रभात हो गया"


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10 टिप्‍पणियां:

दर्पण साह 'दर्शन' ने कहा…

बेशक सूरज किरणों की पूरी फ़ौज लेकर लड़ा और जीता भी, किन्तु दीप का एकाकी युद्ध ,लड़ने कि जिजीविषा और उसकी हार (जो कि अवश्यम्भावी थी) से उपजा वीर रस प्रभावित कर गया. कई बार क्रांति के लिए दिए गए छोटे छोटे बलिदान , नींव की ईंट की तरह 'Unnoticed' ही रह जाते है. सनद रहे कि १९४७ से पहले एक १८४७ भी था.

dilip rathore shamgarh ने कहा…

"रात और प्रभात" में दीपक की लौ को गवाह बनने का जो दंड मिला ऐसे ही उदाहरण न्याय प्रक्रिया में भी देखने में आते हैं जब गवाहों की कुर्बानी हो जाती है। ठीक ही कहा है-"सबै सहायक सबल के ,निबल न कोई सहाय। पवन जगावत आग को दीपहिं देत बुझाय।"

kshama ने कहा…

Bahut sundar rachana! Anek shubhkamnaon sahit swagat hai!

shama ने कहा…

Behad sundar rachana!

जयराम “विप्लव” { jayram"viplav" } ने कहा…

कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,

धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,

कलम के पुजारी अगर सो गये तो

ये धन के पुजारी वतन बेंच देगें।

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kapil ने कहा…

तिमिर के इशारे पर आंधी ने दीपक बुझा दिया और लोग विजयी अनैतिक शक्ति के सुर में सुर मिलाने लगे ,आज भी यही हो रहा है। काली करतूतों वाले अनैतिक लोग चुनावों में जीत रहे हैंऔर जनता उनके जयकारे लगा रही है।

ramesh ने कहा…

"रात और प्रभात" में निहित भावार्थ संदेशात्मक हैं। जब आदमी सोता रहता है उस दर्म्यान कितना कुछ घतित हो गया लोगों को क्या मालूम? बधाई!

संगीता पुरी ने कहा…

इस नए चिट्ठे के साथ आपका हिंदी ब्‍लॉग जगत में स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

vinod ने कहा…

मन्जिल दूर नजर आती है आकर्षक ,सुन्दर,मन भावन"
अंध्रेरा मंजिल की ओर उठते कदमों का प्रतिरोध करता है और उजाला राही के कदमों को सहारा देता है। ग्यान के सर्च लाईट से अंधेरे को चीर कर बढना पुरुषार्थ है।

arun ने कहा…

सुन्दर रचना.दर्पन साह दर्शन ने अच्छी टिप्पणी लिखी है। धन्यवाद!