4/3/10

आज का इन्सान.- डॉ॰दयाराम आलोक

दैनिक ध्वज में प्रकाशित कृति



इन्सान,
वक्त के साथ
कहीं और आगे
तेज रफ़्तारसे
बढ रहा है
असूलों का ब्रेक
रद्दी हो गया है
हर कदम
हर तिकडम
फ़्री स्टाइल है.
नई रोशनी में पला
धोखे की कला
खूब जानता है
लोमडी की तरह
आज का इन्सान.
बकवास
करता है
अखबार पढता है।
झगडता है
होटलों में
मुर्गों की तरह
आज का इन्सान
मोहब्बत
करता है
जिस्मानी रोनक से
मेहफ़िल और दौलत से
सट्टे से घायल
"वायदे"का कायल
बर्बादी में मस्ताना
आज का इन्सान

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